प्रोo वीo केo सिंह
कुलपति

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर को स्वातंत्र्योत्तर काल के प्रथम विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है। अपने स्थापना काल से ही यह विश्वविद्यालय अपने परिक्षेत्र के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक मूल्यों एवं परम्पराओं को अक्षुण्ण रखने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता रहा है। काल-क्रमिक विकास में यह विश्वविद्यालय चार विश्वविद्यालयों- डॉ0 राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद; वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर; सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु, सिद्धार्थनगर; जननायक चन्द्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया— का जनक रहा है।

महात्मा बुद्ध की उदात्त करूणा, महायोगी गुरू श्रीगोरक्षनाथ की तप-साधना, सन्त-प्रवर कबीर की युगान्तकारी वैचारिकी, भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार के भगवत्- प्रेम की अनुपमेय सम्प्रेषणीयता और अमर बिस्मिल का देश हित में आत्मोत्सर्ग द्वारा ही मुख्य रूप से विश्वविद्यालयीय परिक्षेत्र के लोकचित का निर्माण हुआ है। गोरखपुर शहर में नाथपंथ का सर्वोच्च अधिष्ठान- श्रीगोरक्षनाथ मंदिर-स्थित है जो महायोगी श्रीगोरक्षनाथ की तपोभूमि है और यही पर वे समाधिस्थ हुए। श्रीगोरक्षनाथ मंदिर को एक सिद्धपीठ होने की मान्यता के साथ-साथ आस्था एवं अर्चना के प्रमुख केन्द्र के रूप में ख्याति है। श्रीगोरक्षपीठ के पूज्य पीठाधीश्वरों ने समरस समाज के निर्माण में, हिन्दू-संस्कृति के पुनरूद्धार में, सुचितापूर्ण राजनीतिक नेतृत्व में अभूतपूर्व योगदान दिया है। Read more..

प्रोo रविशंकर सिंह
विशेष कार्याधिकारी

भारत वर्ष का प्राणतत्व हिन्दुधर्म में सन्निहित है और भारतीय लोकचित आध्यात्मिक है। प्राचीन चिन्तन प्रणाली दार्शनिक होते हुए भी पूर्णतः वैज्ञानिक है। प्राचीन भारतीय ऋषि एवं अध्येताओं के चिन्तन के विषय- वस्तु मुख्यतः प्रकृति और पुरूष है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति से प्रारम्भ कर सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवयवों के प्रति संवेदनशील विश्लेषण भारतीय चिन्तन की अमूल्य थाती है। दर्शन का विषय एवं उद्देश्य ब्रह्मांड की मूलसत्ता का अन्वेषण करना है। प्राचीन भारतीय मनीषियों ने इस सत्ता की खोज में अपने जीवन अर्पण किए है। भारतीय दर्शन में एक दर्शन-अद्वैतवाद-सर्वाधिक प्रभावकारी रहा हैं क्योंकि यह दर्शन अद्भूत योगेश्वर्य के धनी, प्रखर विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न आचार्य शंकर (आठवीं शती में प्रादूर्भूत) के भाष्यों से विकसित एवं स्थापित हुआ है। आचार्य शंकर ने अद्वैतवाद के तीनों प्रस्थानों- उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता- पर भाष्य लिखा है। ब्रह्मसूत्र पर आचार्य शंकर का शारीरिक भाष्य सर्वप्रसिद्ध प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता है। आचार्य शंकर ने अद्वैतवाद-दर्शन को सर्वोत्कृष्ट प्रतिष्ठा प्रदान की है। जब बौद्धधर्म के अनुशीलक तात्रिकों और सिद्धों के चमत्कार एवं अभिचार बदनाम होने लगें तब आचार्य शंकर ने वैदिक सनातन धर्म की पुर्नस्थापना हेतु भारत वर्ष के चारों कोनों पर चार पीठों (पूर्व में गोवर्धनमठ, पश्चिम में शारदामठ, उत्तर में बदरिकाश्रम, दक्षिण में श्रृंगेरीमठ) का निर्माण कर हिन्दू धर्म व संस्कृति की अभूतपूर्व सेवा की है। पुनश्च वैदिक सनातन धर्म व संस्कृति बाह्य आडंबरों, तर्कहीन कर्मकाण्डों के भँवर-जाल में फस गया तब समाज, जाति-पात, उँच-नीच छुआछूत जैसी अमानवीय घृणित विकृतियों से आवद्ध हो गया। ऐतिहासिक दृष्टि से लगभग दसवीं शती में महायोगी गुरु श्रीगोरक्षनाथ के लोकोपयोगी उपदेशों के प्रभाव से समाज में समरसता का बीजारोपण हुआ। Read more..

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